मंगलवार, फ़रवरी 21, 2012

कविता

नाईट, मिकलोयुस चिर्लोनिअस
Night, Mikalojus Ciurlionis

और ऐसा हुआ उस समय...कविता मुझे 
खोजती हुई आई. पता नहीं, 
पता नहीं कहाँ से,
कूद पड़ी वो, जाड़ों से या नदी से.
पता नहीं कब और कैसे,
नहीं, शब्द नहीं, आवाजें
नहीं, मौन भी नहीं,
मगर मुझे सड़क से बुलाया गया,
रात की टहनियों से,
अचानक, औरों से,
प्रचण्ड लपटों में, 
या अकेले लौटते हुए,
मैं, बिना चेहरे के था,
जब उसने मुझे छुआ.

मैं जानता नहीं था कहना, मेरा मुंह,
कोई नाम नहीं,
मेरी आँखें,
अंधी थीं,
फिर कुछ होने लगा मेरी आत्मा में,
ज्वर या खो चुके पंख जैसा,
और मैं पहुँच गया अकेला, 
उस अग्नि की
गूढ़ लिपि खोलता,
और मैंने लिखी पहली, अस्पष्ट पंक्ति,
अस्पष्ट, बिना तत्व की, बिल्कुल
अनर्थक,
कुछ नहीं जानने वाले का 
विशुद्ध ज्ञान,
और अचानक देखा 
ताले खोलता
आकाश,
और खुलना,
नक्षत्रों, 
स्पंदित होते अंतरिक्षों,
छिद्रित छायाओं का,

जो छलनी है 
ज्वालाओं से, फूलों से, उड़ानों से,
घूमती रात से, ब्रह्माण्ड से.
और मैं इस सब में सबसे छोटा, तुच्छ,
इस विशाल शून्य से मदहोश,
तारों से आच्छादित,
छवि में, रहस्य 
का प्रतिरूप,
मुझे लगा जैसे कि मैं हूँ 
वितल का अनन्य अंग,
तारों के उजालों के संग घूमता,
मेरा मन बहती हवा में मुक्त उड़ने लगा.


-- पाब्लो नेरुदा 



पाब्लो नेरुदा ( Pablo Neruda ) को कौन नहीं जानता. वे चिली के कवि थे.कोलंबिया के महान उपन्यासकार गेब्रिअल गार्सिया मार्केज़ ने उन्हें ' 20 वीं सदी का, दुनिया की सभी भाषाओँ में से सबसे बेहतरीन कवि ' कहा है. 10वर्ष की आयु में उन्होंने कविताएँ लिखनी शुरू की. 19वर्ष की आयु में उनका पहला संकलन 'क्रेपेस्क्युलारियो ' प्रकाशित हुआ और उसके बाद उनकी प्रसिद्द प्रेम कविताएँ ' ट्वेंटी पोएम्ज़ ऑफ़ लव एंड अ सोंग ऑफ़ डेसपैर '. दोनों संकलन खूब सराहे गए और दूसरी भाषाओँ में अनूदित लिए गए. उनकी प्रेम कविताओं की तो सहस्रों प्रतियाँ आज तक बिक चुकी है. उनके पूरे लेखन काल में उनकी 50से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई और अनेक भाषाओँ में असंख्य अनुवाद हुए. 1971में उन्हें नोबेल प्राइज़ भी प्राप्त हुआ. यह कविता उनके संकलन  'मेमोरिआल दे इस्ला नेग्रा' से है.
इस कविता का मूल स्पेनिश से अंग्रेजी में अनुवाद ए एस क्लाइन ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड

12 टिप्‍पणियां:

  1. "मुझे लगा जैसे कि मैं हूँ
    वितल का अनन्य अंग,
    तारों के उजालों के संग घूमता,
    मेरा मन बहती हवा में मुक्त उड़ने लगा".
    तुरत अपनी गिरफ़्त में ले लेने वाला अनुवाद. बधाई, रीनू.

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  2. कविता सौन्दर्य के उत्कट अनुभव ,जो कहीं भी ,कभी भी कवि मन में उद्घाटित हो जाता है ,को भाषा में अनूदित करने के प्रयास का परिणाम है ! हर रचना में कामो-बेश यही सौन्दर्यानुभूति अपनी अहम् भूमिका के साथ उपस्थित होती है !इस कविता में पाब्लो इसी सौन्दर्यनुभव से गुजर रहे हैं और उसे शब्दों में उतारने का प्रयास कर रहे हैं ! ऐसी कविताओं का अनुवाद बहुत कठिन काम है लेकिन रीनू जी ने इसे सुन्दरता से किया है जो कि एक बड़ी बात है ! उन्हें बधाई !

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