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कैफ़े तेरास, प्लास दयु फोरम विन्सेंट वान गोग Cafe Terrasse, Place du Forum Vincent Van Gogh |
वो पहली चंद घड़ियाँ नए शहरों के कैफे में!
एक शांत दीप्त मौन से पूर्ण,
स्टेशन या बंदरगाह पर सुबह-सुबह की आमद!जहाँ अभी-अभी पहुंचे हों
उस शहर के सबसे पहले दिखे पैदल लोग,
और जब हम यात्रा करते हैं,
वह समय के बीतने की अनोखी आवाज़...
बसें या ट्रामें या गाड़ियाँ...
अनूठे देशों में सड़कों की अनूठी छटा...
शान्ति, जो वे देती प्रतीत होती हैं हमारे दुःख को,
ख़ुशी-भरी हलचल, जो हमारी उदासी के लिए है उनके पास,
हमारे मुरझाये-हुए मन के लिए नीरसता की अनुपस्थिति!
बड़े, विश्वसनीय ढंग से समकोणीय चौक,
इमारतों की कतारों वाली सड़कें जो दूर जाकर मिल जाती हैं,
एक-दूसरे को काटती सड़कें जहाँ अपनी रूचि का कुछ-न-कुछ
मिल जाता है अकस्मात ही,
और इस सब में, जैसे कुछ उमड़ता है बिना कभी बह निकलने के,
गति, गति,
द्रुत रंग की मानुषिक चीज़ जो आगे बढ़ जाती है और रह जाती है...
द्रुत रंग की मानुषिक चीज़ जो आगे बढ़ जाती है और रह जाती है...
बंदरगाह अपने रुके हुए जहाज़ लिए,
अत्यधिक रूप से रुके हुए जहाज़,
और छोटी नावें पास में, प्रतीक्षा करती हुई...
-- फेर्नान्दो पेस्सोआ (आल्वरो द कम्पोस )

इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़