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सेल्फ-पोर्ट्रेट विद बोनितो, फरीदा कहलो Self-Portrait With Bonito, Frida Kahlo |
आज फिर मैं अपने आप में नहीं हूँ.
ऐसा बार-बार होता है.
लगता है जैसे कुछ दैवी है.
नीली लहर-सा
वह बहता है मुझ में.
हरे पत्ते -- तुम शायद मानोगे नहीं --
एक-आध बार
फूट आये हैं मेरी उँगलियों के पोरों से
कहीं
घने जंगल में
वसंत के उन्मादी दौरे में.
हालाँकि, बेशक, जानती हूँ मैं वह दूसरा गीत,
एक-ता का वह मधुर आवेश.
अभी कल ही मैंने एक चींटी को रास्ता पार करते देखा,
नीचे गिरे चीड़ के पत्तों में से राह बनाते.
और मैंने सोचा:
वह इस जीवन के सिवा कोई दूसरा जीवन कभी नहीं जियेगी.
और मैंने सोचा:
अगर पूरे जी-जान से वह अपना जीवन जीती है
तो क्या वह अद्भुत रूप से बुद्धिमान नहीं है?
और इस चमत्कारी पहाड़ पर मैं तब तक चढ़ती रही,
गुज़रती रही होकर सब चीज़ों से
जब तक मैं स्वयं तक न पहुँच गई.
और फिर भी, इन उत्तरीय वनों में भी,
और इन रेत के टीलों पर,
मैं स्वयं की दूसरी खिड़की में से उड़ निकली हूँ
सफ़ेद बगुला बनने, या फिर नीली व्हेल मछली,
लाल लोमड़ी, या साही.
आह, कितनी बार मेरे तन को पहले ही था
किसी फूल का तन होने का एहसास!
कितनी बार मेरा मन पहले ही है एक लाल तोता,
घने विचित्र-से पेड़ों के बीच बैठा,
अपने पंख फड़फड़ाता और चिल्लाता हुआ.
-- मेरी ओलिवर

इस कविता का हिन्दी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़