रविवार, मई 15, 2011

कहाँ किसके बिना

ट्रीज़ एंड अंडरग्रोथ 2, विन्सेंट वान गोग
Trees And Undergrowth 2, Vincent Van Gogh





नहीं है 
पेड़ों के बीच कोई भी
और मैं 
न जाने मैं कहाँ चला गया हूँ 



-- ओक्तावियो पास 



  ओक्तावियो पास ( Octavio Paz )मेक्सिको के लेखक व कवि थे. वे कुछ साल भारत में मेक्सिको के राजदूत भी रहे. उनके लेखन पर मार्क्सवाद, स्यूरेयालीज्म, एग्ज़िस्टेन्शलिज़म के साथ हिन्दू व बौध धर्मों का भी बहुत प्रभाव रहा. उनकी कविताओं व निबंधों के असंख्य संकलन छपे हैं व अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. सैम्युएल बेकेट, एलीजाबेथ बिशप, मार्क स्ट्रैंड जैसे जाने-माने कवियों-लेखकों ने उनके लेखन का अंग्रेजी में अनुवाद किया है. सर्वंतेस प्राइज़ व 1990 के नोबेल पुरस्कार सहित उन्हें अनेक सम्मान मिले थे.
इस कविता का मूल स्पेनिश से अंग्रेजी में अनुवाद एलियट वाइनबर्गर ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

शनिवार, मई 14, 2011

रोशन

रेनबो, औग्यूस्त रोदें
Rainbow, Auguste Rodin


हवा से अधिक 
पानी से अधिक 
होंठों से अधिक 
रोशन रोशन 
तुम्हारा बदन 
संकेत भर है
तुम्हारे बदन का 


-- ओक्तावियो पास 




  ओक्तावियो पास ( Octavio Paz )मेक्सिको के लेखक व कवि थे. वे कुछ साल भारत में मेक्सिको के राजदूत भी रहे. उनके लेखन पर मार्क्सवाद, स्यूरेयालीज्म, एग्ज़िस्टेन्शलिज़म के साथ हिन्दू व बौध धर्मों का भी बहुत प्रभाव रहा. उनकी कविताओं व निबंधों के असंख्य संकलन छपे हैं व अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. सैम्युएल बेकेट, एलीजाबेथ बिशप, मार्क स्ट्रैंड जैसे जाने-माने कवियों-लेखकों ने उनके लेखन का अंग्रेजी में अनुवाद किया है. सर्वंतेस प्राइज़ व 1990 के नोबेल पुरस्कार सहित उन्हें अनेक सम्मान मिले थे.
इस कविता का मूल स्पेनिश से अंग्रेजी में अनुवाद योहानन बैल्हार्ज़ ने किया.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

गुरुवार, मई 12, 2011

मैंने तुम्हें चाहा, नहीं चाहा

स्टडी ऑफ़ पाइन ट्रीज़, विन्सेंट वान गोग
Study Of Pine Trees, Vincent Van Gogh
मैंने चाहा तुम्हें, 
नहीं तुम्हें नहीं चाहा.
मैंने वह चाहा 
जो पीछे से चलता आ रहा था.
हमारे लिए
रास्ते खुल जायेंगे.
जीवन ले जायेगा हमें
अपनी प्रकृति के पास.
पुरातन चीड़ के पेड़ तले
हम अपनी परछाइयाँ भूल जायेंगे,
वहीँ छाँव में बैठा छोड़ आयेंगे. 
हमारे रास्तों पर  
एक नया दिन निकलेगा.
अलग-अलग हैं हमारी परछाइयाँ --
वो गले नहीं मिलती,
ना ही पंछियों की बातों का
जवाब देती हैं.
मैंने कहा था -- याद करना हो 
तो परछाई को करना. 

-- महमूद दरविश 

 महमूद दरविश ( Mahmoud Darwish )एक फिलिस्तीनी कवि व लेखक थे जो फिलिस्तीन के राष्टीय कवि भी माने जाते थे. उनकी कविताओं में अक्सर अपने देश से बेदखली का दुःख प्रतिबिंबित होता है. उनके तीस कविता संकलन व आठ किताबें छप चुकी हैं. अपने लेखन के लिए, जिसका बीस भाषाओँ में अनुवाद भी हो चुका है, उन्हें असंख्य अवार्ड मिले हैं. फिलिस्तीनी लोगों के 'वतन' के लिए संघर्ष के साथ उनकी कविताओं का गहरा नाता है. जबकि उनकी बाद की कविताएँ मुक्त छंद में  लिखी हुईं और कुछ हद तक व्यक्तिगत हैं, वे राजनीती से कभी दूर नहीं रह पाए.
इस कविता का मूल अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद फादी जूदह ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

मंगलवार, मई 10, 2011

हरे-हरे से भारत में

लैंडस्केप, रवीन्द्रनाथ टैगोर
Landscape, Rabindranath Tagore
हरे-हरे से भारत में 
जहाँ शांत पेड़ 
नीले पानी पर झुके रहते हैं,
टैगोर रहते हैं.

समय खड़ा रहता है वहां 
मंत्रमुग्ध-सा ,
गहरा नीला एक वृत्त.
घडी,
न महीना बताती है न साल,
बस मंदिरों के शिखरों पर से,
पेड़ों के पर्वतों पर से, 
किन्हीं अदृश्य कलों से 
संचालित,
एक मौन में तरंगित होती है.

वहां कोई मर नहीं रहा, 
कोई विदा नहीं ले रहा --
एक पेड़ पर अटका
जीवन अनंत है ...

-- स्रेच्को कोसोवेल 

   स्रेच्को कोसोवेल ( Srečko Kosovel ) स्लोवीनिया के कवि थे जिन्हें स्लोवीनिया का 'रिम्बो' भी कहा जाता है. 22 साल की अल्पायु में ही उनका देहांत हो गया था, मगर अपने पीछे वे लगभग एक हज़ार सुन्दर कविताएँ छोड़ गए. अब वे मध्य-यूरोपीय माडर्नस्ट कविता के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं. उनकी कविताएँ प्रथम विश्व युद्ध के बाद की हताशा व खलबली दर्शाती हैं.हैरानी की बात है की मध्य-यूरोप के छोटे कसबे में रहते कोसोवेल ने, टैगोर की लेखन में, वह शान्ति व दर्शन पाया जो वे खोज रहे थे. उनकी कविताओं में पचास से भी अधिक बार टैगोर का उल्लेख होता है.
 इस कविता का मूल स्लोवीनियन से अंग्रेजी में अनुवाद आना जेल्निकर व बारबरा सीगल कार्लसन ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 





शनिवार, मई 07, 2011

प्यार

द सोअर  (स्टडी ), विन्सेंट वान गोग
The Sower (Study), Vincent Van Gogh
कितनी दूर है मेरी रात
तुम्हारी रात से!
और कितनी और रातें,
ऊंचे पर्वतों-सी, 
उठी हुई हैं इन दोनों के बीच.

मैंने तुम्हारे लिए रास्ता भेजा था,
पर तुम नहीं मिले. 
थक के लौट आया वो मेरे पास.
अपना गीत-हिरन भेजा था. 
पर शिकारियों के निशानों से घायल, 
लौट आया वो मेरे पास.
जाने कौन सी दिशा ली हवा ने,
जंगल में, दर्द की कंदराओं में भटक, 
अंधी होकर
लौट आई वो मेरे पास.

एक निराश बारिश झर रही है.

कल सुबह-सुबह, 
एक इन्द्रधनुष भेजूं क्या?
तुम्हे ढूँढने. 
लेकिन वो, ख़ुशीयों-सा नादान,
एक ही पहाड़ पार कर पायेगा.

मैं स्वयं ही निकलूंगा रात में 
ढूंढूंगा, ढूंढूंगा, ढूंढूंगा, 
जैसे अँधेरे कमरे में हाथ टटोलता है,
ढूंढता है बुझे हुए दिए को.

-- विसार ज्हीटी

  विसार ज्हीटी ( Visar Zhiti )अल्बेनिया के कवि व लेखक हैं. वे कॉलेज में पढ़ाते थे जब उनका पहला कविता संकलन छपने लगा था, और सियासी हालातों की वजह से उनके लेखन को भड़काने वाला साबित कर, उन्हें जेल में बंद कर दिया गया. कागज़-कलम की मनाही थी, और उन्होने 100 से अधिक कवितायेँ रची व याद रखी.13 साल उन्होंने कांसनट्रेशन कैम्प  में यातनाएं सह कर बिताये. उनके कुल 6 कविता-संकलन छपे हैं व उनकी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ है.
इस कविता का अल्बेनियन से अंग्रेजी में अनुवाद राबर्ट एलसी ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

गुरुवार, मई 05, 2011

बस यही

द गोल्डन ऑटम, लिओनिद पास्तरनाक 
एक घाटी और ऊपर पतझड़-रंगे जंगल. 
एक यात्री आता है, 
एक नक्शा उसे वहां लाता है. 
या शायद स्मृति. 
बहुत समय पहले एक दिन, 
जब पहली बर्फ गिर रही थी,
इस तरफ आते हुए उसे ख़ुशी महसूस हुई थी, 
इतनी ख़ुशी, अकारण, आँखों से छलकती.
सब कुछ हिलते पेड़ों की लय में था,
उड़ते पंछी की लय में 
पुल पार करती रेलगाड़ी की लय में... 
एक गतिशील उत्सव.
फिर वो बहुत सालों बाद लौटता है,
अब उसे कुछ नहीं चाहिए.
बस केवल एक चीज़, कुछ अनमोल:
एक दृष्टि -- सीधी, साफ़, नाम बिना,
अपेक्षा, उम्मीद, डर बिना,
एक दृष्टि...उस कगार पर 
जहाँ कोई मैं नहीं, जहाँ मैं नहीं.


-- चेस्वाफ़ मीवोश 


चेस्वाफ़ मीवोश (Czeslaw Milosz) पोलैंड के प्रसिद्द कवि, लेखक व अनुवादक थे. उनका जन्म लिथुएनिया में हुआ था और वे पांच भाषाएँ जानते थे -- पोलिश, लिथुएनिअन,रशियन, अंग्रेजी व फ्रेंच. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात,1951 में उन्होंने पोलैंड छोड़ फ्रांस में आश्रय लिया, और 1970 में अमरीका चले गए. वहां वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया में पोलिश साहित्य के प्रोफ़ेसर रहे. उनके 40 से भी अधिक कविताओं व लेखों के संकलन प्रकाशित हुए हैं व कई भाषाओँ में अनूदित किये गए हैं. अन्य कई सम्मानों सहित उन्हें 1980 में नोबेल प्राइज़ भी मिल चुका है.
इस कविता का मूल पोलिश से अंग्रेजी में अनुवाद रोबेर्ट हास ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

मंगलवार, मई 03, 2011

उजाले

गोल्डफिश, ओंरी मातीस

साफ़ खुला आकाश, 
हवा चुप है, एकदम स्थिर, 
मैं आँगन के छोटे तालाब के पास बैठा हूँ. 
पानी में हौले-से हिलती सोन मछलियाँ,
उनकी झिलमिलाती चमक और मैं --
ऐसे साथ हैं हम 
जैसे मिट्टी और पानी.

ताज़े धुले गुच्छों में जीवन जैसे सघन हो जाता है. 
माँ मीठी बेज़िल की पत्तियां धो रही है. 
नान और पनीर, साफ़ खुला आकाश,
पेट्यूनिया की पंखुड़ियों का भीगा मखमल.
इस आँगन के फूल-पत्तों के बीच कहीं,
बहुत पास ही है मुक्ति.

पीतल के कटोरे को 
कैसे दुलार रही है रोशनी.
ऊंची दीवारों से लगी सीढ़ी से 
पग-पग नीचे उतरती है सुबह 
और बिछ जाती है ज़मीन पर.
हर चीज़ की रहस्यमय मुस्कान के पीछे 
समय के घेरे में एक छोटी-सी खिड़की है, 
जिस से मेरा चेहरा बाहर झांकता है.

कितना कुछ है जो मैं नहीं जानता मगर, 
अगर मैं वो टहनी तोड़ लूँगा, 
जानता हूँ , मर जाऊँगा.
मैं बहुत ऊपर उठ जाऊँगा 
और मेरे पंख निकल आयेंगे. 
मैं अँधेरे में एक राह देख रहा हूँ. 
मैं एक दीपक हूँ. 
रेत, रोशनी, पेड़ों भरे जंगल 
और मैं...एक हैं हम सब.
मैं रास्ता हूँ, पुल हूँ,
नदी हूँ, लहरें हूँ,
पानी पे तिरती एक पत्ते की छाया 
मेरे अनंत एकांत को भर देती है. 

--सोहराब सेपेहरी 


सोहराब सेपेहरी फारसी नयी कविता के प्रख्यात कवि व ईरान के सर्वश्रेष्ठ माडर्नस्ट पेंटर थे. उनकी कविताएँ मानवतावादी हैं व प्रकृति के प्रति उनके प्रेम को झलकाती हैं. उन्होंने ने फ़ारसी कविता को नया मुहावरा दिया क्योंकि वे बौद्ध धर्मं, रहस्यवाद व पश्चिमी परम्पराओं से प्रभावित थे. साथ ही मुक्त छंद में लिख कर उन्होंने एक नयी शैली को भी स्थापित किया. उनकी कविताओं का अनेक भाषाओँ में अनुवाद किया गया है.

इस कविता का मूल फारसी से अंग्रेजी में अनुवाद जेरोम डब्ल्यू क्लिंटन ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़