गुरुवार, जुलाई 05, 2012

झगड़ा

फॉर वावा, मार्क शगाल
For Vava, Marc Chagall
मगर जब हम झगड़ते थे,
कमरा घूम कर क़दमों में ढह जाता था,
नीली पड़ती चोट लिए हवा आहत लगती थी,
सूरज आकाश का फाटक धम्म से बंद कर के
भाग जाता था.

मगर जब हम झगड़ते थे,
पेड़ रोते थे और अपने पत्ते उतार फेंकते थे,
दिन क्रूरता से छीन लेता था घंटे हमारे जीवन से,
और बिस्तर पर चादर-तकिये
अपने चीथड़े कर लेते थे.

मगर जब हम झगड़ते थे,
हमारे होंठ नहीं जानते थे कोई चुम्बन, चुम्बन, चुम्बन,
हमारे मन हो जाते थे मुट्ठी में पकड़े नुकीले पत्थर,
बागीचे में उग आती थी हड्डियाँ,
जो मरे हुओं से निकलती थीं.

मगर जब हम झगड़ते थे,
तुम्हारा चेहरा शब्द-मिटाए पन्ने-सा भावशून्य हो जाता था,
मेरे हाथ एक-दूसरे को मलते थे, जलते थे क्रियाओं की तरह,
प्रेम पलट कर भाग जाता था,
और दुबक जाता था हमारे मस्तिष्क में कहीं.



-- कैरल एन डफ्फी






 कैरल एन डफ्फी ( Carol Ann Duffy )स्कॉट्लैंड की कवयित्री व नाटककार हैं. वे मैनचेस्टर मेट्रोपोलिटन युनिवेर्सिटी में समकालीन कविता की प्रोफ़ेसर हैं. 2009 में वे ब्रिटेन की पोएट लॉरीअट नियुक्त की गईं. वे पहली महिला व पहली स्कॉटिश पोएट लॉरीअट हैं. उनके स्वयं के कई कविता संकलन छ्प चुके हैं. उन्होंने कई कविता संकलनों को सम्पादित भी किया है. अपने लेखन के लिए उन्हें अनेक सम्मान व अवार्ड मिल चुके हैं. सरल भाषा में लिखी उनकी कविताएँ अत्यंत लोकप्रिय हैं व स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा भी हैं. यह कविता उनके 2005 में छपे संकलन ' रैप्चर ' से है, जिसे टी एस एलीअट प्राइज़ मिला था.
इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़  
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपसी झगड़े का कितना जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है कविता ! बहुत सुंदर अनुवाद और प्रस्तुति ! आभार !

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  2. वाह !!!!
    आईने में गर अपना चेहरा देख कुछ सीख जायें तो सब कुछ खुशनुमां हो...है न????
    बहुत सुंदर अनुवाद और कविता.... शुक्रिया !!!!

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