मंगलवार, जुलाई 03, 2012

क्या तुम छुट्टी पर जाने दोगी मुझे?

ऑन द बालकनी, बोरिस कुस्तोदियेव
On The Balcony, Boris Kustodiev
स्त्री जो भीतर बसती हो मेरे
क्या तुम
छुट्टी पर जाने दोगी मुझे
और आनंद उठाने दोगी
पहाड़ों का
जैसे दूसरे उठाते हैं?
पहाड़ हैं जैसे
रेशम का स्पेनी हाथ-पंखा
जिस पर तुम बनी हुई हो
तुम्हारी आँखों के पंछी
झुण्ड बना कर आते हैं
समुद्र के किनारे से
जैसे शब्द
एक नीली नोटबुक के
पन्नों से उड़-उड़ जाते हैं.
क्या तुम मेरी स्मृति को
अपनी सुगंध का घेरा
तोड़ कर बाहर आने दोगी
लेने के लिए
बेज़िल और जंगली थाइम की गंध?
क्या तुम बैठने दोगी मुझे
एक गर्मियों की बालकनी पर
बिना तुम्हारी आवाज़
मुझ तक पहुंचे? 





-- निज़ार क़ब्बानी



निज़ार क़ब्बानी ( Nizar Qabbani )सिरिया से हैं व अरबी भाषा के कवियों में उनका विशिष्ट स्थान है. उनकी सीधी सहज कविताएँ अधिकतर प्यार के बारे में हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या वे क्रन्तिकारी हैं, तो उन्होंने कहा -- अरबी दुनिया में प्यार नज़रबंद है, मैं उसे आज़ाद करना चाहता हूँ. उन्होंने 16 वर्ष की आयु से कविताएँ लिखनी शुरू कर दी थीं, और उनके 50 से अधिक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनकी कविताओं को कई प्रसिद्ध अरबी गायकों ने गया है, जिन में मिस्र की बेहतरीन गायिका उम्म कुल्थुम भी हैं, जिनके गीत सुनने के लिए लोग उमड़ पड़ते थे.

इस कविता का मूल अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद बस्सम के.फ्रंगिये व क्लेमनटीना आर. ब्राउन ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

3 टिप्‍पणियां:

  1. किसी के प्यार में पूरी तरह गिरफ्तार होने के बाद अपनी निजता को वापस पाने की बेचैनी को शब्दो में ढाला है कब्बानी ने | सुंदर अनुवाद के लिए रीनू जी को बधाई !

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  2. बहुत ही लाजवाब रचना है कब्बानी जी की ... शुक्रिया इस अनुवाद का ...

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