रविवार, अक्तूबर 21, 2012

पतझड़ का दिन

ऑटम लीव्ज़, आइसाक लेवितान
Autumn Leaves, Isaac Levitan
हे ईश्वर, समय आ गया है. गर्मियाँ भरपूर थीं.
धूप-घड़ी पर डालो अपनी छायाएँ,
खुली छोड़ दो अपनी हवाएँ खेतों के पार.

आखिरी फलों को हुक्म दो पकने का.
प्रदान करो उन्हें दो और दक्षिणी दिन,
लाओ उन्हें पूर्णता पर और निचोड़ लो
उनकी अंतिम मिठास सघन सुरा में.

जिसके पास अब घर नहीं है
वह घर नहीं बनाएगा.
जो अकेला है अब वह अकेला ही रहेगा,
देर रात तक पढ़ेगा, लम्बे पत्र लिखेगा,
और, व्याकुल, घूमेगा सड़कों पर
जहाँ पत्ते उड़ते है इधर-उधर.


-- रायनर मरीया रिल्के



 रायनर मरीया रिल्के ( Rainer Maria Rilke ) जर्मन भाषा के सब से महत्वपूर्ण कवियों में से एक माने जाते हैं. वे ऑस्ट्रिया के बोहीमिया से थे. उनका बचपन बेहद दुखद था, मगर यूनिवर्सिटी तक आते-आते उन्हें साफ़ हो गया था की वे साहित्य से ही जुड़ेंगे. तब तक उनका पहला कविता संकलन प्रकाशित भी हो चुका था. यूनिवर्सिटी की पढाई बीच में ही छोड़, उन्होंने रूस की एक लम्बी यात्रा का कार्यक्रम बनाया. यह यात्रा उनके साहित्यिक जीवन में मील का पत्थर साबित हुई. रूस में उनकी मुलाक़ात तोल्स्तॉय से हुई व उनके प्रभाव से रिल्के का लेखन और गहन होता गुया. फिर उन्होंने पेरिस में रहने का फैसला किया जहाँ वे मूर्तिकार रोदें के बहुत प्रभावित रहे.यूरोप के देशों में उनकी यात्रायें जारी रहीं मगर पेरिस उनके जीवन का भौगोलिक केंद्र बन गया. पहले विश्व युद्ध के समय उन्हें पेरिस छोड़ना पड़ा, और वे स्विटज़रलैंड में जा कर बस गए, जहाँ कुछ वर्षों बाद ल्यूकीमिया से उनका देहांत हो गया. कविताओं की जो धरोहर वे छोड़ गए हैं, वह अद्भुत है. यह कविता उनके संकलन 'बुक ऑफ़ इमेजिज़ ' से है.
इस कविता का जर्मन से अंग्रेजी में अनुवाद जोआना मेसी व अनीता बैरोज़ ने किया है. 
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता में रिल्के की खुद की यायावरी की झलक मिलती है जो पतझड़ के पत्तों की तरह देश देश भटकते रहे थे.

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  2. जीवन के प्रति बेचैनी दिखाती है यह कविता ...सूखे पत्तों की तरह इधर-उधर उडता हुआ जीवन अब पूर्णता की मांग कर रहा है !

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