रविवार, अप्रैल 14, 2013

जब हमें चाहिए होते हैं शब्द

डौन, मार्क शगाल
Dawn, Marc Chagall

इस आरंभिक पल से पहले,
एक पल और था, बारिश से सिक्त,
अपने पूर्ण आकार की गंध लिये.

हर दिन वह मुर्गा
जिसे हमने कभी नहीं देखा
करता है पहला अभिवादन
और अँधेरा, जिसने रात भर
रखा था अपनी ढीली जेब में,
अब हमें नीचे धर देता है.

और हम चलते हैं,
कमरों को जगाते हुए
बत्तियां जलाते हुए.
हम जाते हैं उस सांस में जो 
शब्दहीन है मगर है शब्दों की
सभी संभावनाओं से पूर्ण भी,
पूर्ण है उन संदेशों से जो अभी
न एकत्रित किये गए हैं 
न भेजे गए हैं.

सुबह मंडराती है
सबसे अच्छे मित्र से भी
अच्छी मित्र हो कर.

हम कह सकते हैं, अभी भी. 


-- नाओमी शिहाब नाए 



 नाओमी शिहाब नाए ( Naomi Shihab Nye )एक फिलिस्तीनी-अमरीकी कवयित्री, गीतकार व उपन्यासकार हैं. वे बचपन से ही कविताएँ लिखती आ रहीं हैं. फिलिस्तीनी पिता और अमरीकी माँ की बेटी, वे अपनी कविताओं में अलग-अलग संस्कृतियों की समानता-असमानता खोजती हैं. वे आम जीवन व सड़क पर चलते लोगों में कविता खोजती हैं. उनके 7 कविता संकलन और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. अपने लेखन के लिए उन्हें अनेक अवार्ड व सम्मान प्राप्त हुए हैं. उन्होंने अनेक कविता संग्रहों का सम्पादन भी किया है. 


इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

3 टिप्‍पणियां:

  1. उम्मीद जगाती सुबह सम्भावना भरे दिन की शुरुआत है. निशब्द में शब्दों की और अँधेरे में उजाले की सम्भावना हमेशा बनी रहती है.

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