मंगलवार, मई 14, 2013

तुम जानते हो तुम कौन हो

मोन्यूमेंट इन द प्लाज़ा, न्यू यॉर्क,
जॉन फ्रेंच स्लॉन
Monument in the Plaza, New York,
John French Sloan

तुम्हारी कविताएँ मुझे ढाढस क्यों देती हैं, स्वयं से पूछती हूँ.
क्योंकि वे सीधी हैं, ऊँची पीठ की कुर्सियों जैसी.
मैं उनमें बैठ कर देख सकती हूँ दुनिया को जैसे कि 
वह भी सीधी और सरल है. 

क्योंकि कभी-कभी मैं जीती हूँ शब्दों के अंधड़ में
और उनमें से एक भी मुझे बचा नहीं सकता.
तुम्हारी कविताएँ एक बेड़े की तरह आती हैं,
एक साथ बंधे लठ्ठे, जो तैरते हैं.
मैं तुम्हें उस दोपहर के बारे में बताना चाहती हूँ 
जब तुम्हारी कविताओं पर मैं ड्यूरैंगो स्ट्रीट
से ब्रॉडवे तक पूरे रास्ते बही थी.

पिता अपने छोटे बेटों के साथ नदी में नौका चला रहे थे.
पुस्तकालय के बाहर तीन मेक्सिको के लड़के एक-दूसरे के
पीछे भाग रहे थे.
लगता था सभी के पास कोई काम है, कोई कारोबार,
जबकि मैं निरुद्देश्य-सी फिर रही हूँ
उन सडकों पर जिनसे मैं दावा करती हूँ कि मुझे प्यार है. 

अचानक ही अपने नीचे मुझे महसूस हुई तुम्हारी कविताओं की स्पष्ट देह,
एक बेड़े-सी, एक बार फिर शब्द वहनीय लगने लगे मुझे,
जैसे कि एक कप, एक अखबार, एक सुई.
जो कुछ हो रहा था वह एक प्रकाश से घिरा था,
जो किसी अलौकिक चमत्कार-सा नहीं था,
बल्कि था एक शनिवार की दोपहरी का रूखा-सा उजाला.
ऐसी दुनिया का उजाला जो हमें साथ लिए या बगैर लिए
बस तेज़ी से आगे भागती रहती है.
मैं रुक कर पीछे छूटे भवन-समूहों को इस उजाले में
एकत्रित करना चाहती थी, मगर ऐसा हो नहीं पाता.
तुम चलते रहते हो, उठाते हो एक पैर, फिर दूसरा,
यह कहते हुए कि "मुझे यही याद रखने की ज़रुरत है"
और फिर उम्मीद करते हो की तुम रख सको.


-- नाओमी शिहाब नाए 



 नाओमी शिहाब नाए ( Naomi Shihab Nye )एक फिलिस्तीनी-अमरीकी कवयित्री, गीतकार व उपन्यासकार हैं. वे बचपन से ही कविताएँ लिखती आ रहीं हैं. फिलिस्तीनी पिता और अमरीकी माँ की बेटी, वे अपनी कविताओं में अलग-अलग संस्कृतियों की समानता-असमानता खोजती हैं. वे आम जीवन व सड़क पर चलते लोगों में कविता खोजती हैं. उनके 7 कविता संकलन और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. अपने लेखन के लिए उन्हें अनेक अवार्ड व सम्मान प्राप्त हुए हैं. उन्होंने अनेक कविता संग्रहों का सम्पादन भी किया है. यह कविता उनके संकलन 'वर्ड्स अंडर द वर्ड्स'' से है. 


इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

3 टिप्‍पणियां:

  1. शब्दों के चमत्कार और उजाले की कविता.

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  2. एक रुकी हुई कविता के उजाले में दुनियाँ को देखना भी कितना अजीब है जबकि दुनियां भागी चली जा रही है .................सुन्दर कविता का सुन्दर अनुवाद ।

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  3. कविताएं उद्देश्यहीन नहीं होती। वो खालीपन को पूर्णतया न भी भर पाए तो भी नीचे (इसे आलम्बन कहूँगा मैं) देह सरीखी आलम्बन प्रदान करती है। और यूँ कविताएं कुछ विशेष क्षणों में इश्वर का कार्य करती हैं।
    PS: कविता पढ़ के कवियत्री का किसी कवि एवं उसकी कविता के प्रति एक अंतरंग प्रेम प्रदर्शित होता है। ऐसी कुछ कविताएं पढ़ कर आप कवि का जेंडर सही गैस कर लेते हैं। ये अच्छा या बुरा नहीं बस एज़ इट इज़ है।

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