शुक्रवार, जुलाई 08, 2011

आज सवेरे

ए विंड बीटन ट्री, विन्सेंट वान गोग 
A Wind beaten Tree, Vincent Van Gogh

आज बहुत सवेरे मैं घर से निकल पड़ा 
क्योंकि मैं उस से भी जल्दी उठ बैठा था, 
और कुछ करने का मन भी नहीं था.

मैं नहीं जानता था किस ओर जाऊं,
मगर हवा बहुत ज़ोर से एक ओर को चल रही थी,
और जिस ओर वह धकेलती गयी, मैं चलता गया.

हमेशा ऐसा ही रहा है मेरा जीवन,
और हमेशा ऐसा ही रहे, यही चाहता हूँ --
मैं उधर ही जाऊं जिधर हवा मुझे बहा ले जाए
और कुछ सोचने की कभी आवश्यकता न हो.


--  फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'अनकलेक्टिड पोइम्ज़ ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़