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रविवार, अप्रैल 28, 2013

विस्मृति

अ ग्लास ऑफ़ वाइन, पिएर ओग्यूस्त रेनोआ
A Glass of Wine, Pierre Auguste Renoir

केवल मदिरा ही नहीं, मैं उड़ेलता हूँ अपने पात्र में
विस्मृति भी, और मैं सुखी रहूँगा क्योंकि सुख
अनभिज्ञ होता है. स्मृति या पूर्वकल्पना भला 
किसके होंठों पर मुस्कान लाई हैं?

चलो अपनी सोच से हम पा लें, जीवजंतुओं
का जीवन नहीं, उनकी आत्मा, आश्रय लें
उस दुर्बोध भाग्य में
जो न आशा करता है, न स्मरण.

इस नश्वर हाथ से उठा अपने नश्वर मुख तक
ले जाता हूँ मैं क्षणिक मदिरा का यह भंगुर पात्र,
अपनी धुंधली दृष्टि से 
देखना बंद करने के लिए तैयार.


-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( रिकार्दो रेइस)



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने रिकार्दो रेइस ( Ricardo Reis )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'ओड्ज़' से है.

इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

शनिवार, फ़रवरी 16, 2013

नहीं जानता...

ग्रे लवर्ज़, मार्क शगाल
Grey Lovers, Marc Chagall
नहीं जानता कि वह प्रेम जो तुम देती हो,
वह है तुम्हारे पास
या उसके होने का स्वांग करती हो तुम.
तुम मुझे देती हो. उतना ही बहुत होने दो.
मैं अपनी आयु कम नहीं कर सकता,
तो क्यों न कुछ भ्रम ही पाल लूँ?
देवों ने हमें जो दिया है वह कम है,
और जो कम दिया भी है वह झूठा है.
मगर वह कितना भी झूठा क्यों न हो,
अगर उन्होंने दिया है,
उनका देना तो सच्चा है.
मैं उसे स्वीकार करता हूँ,
और तुम्हारा विश्वास करने के लिए
मना लेता हूँ स्वयं को


-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( रिकार्दो रेइस)



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने रिकार्दो रेइस ( Ricardo Reis )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'ओड्ज़' से है.

इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

शनिवार, जनवरी 19, 2013

जब वे मेरी कविताएँ पढ़ें...

चिल्ड्रन एंड सनी ट्रीज़, औगूस्ट मैके
Children and Sunny Trees, August Macke
और जब वे मेरी कविताएँ पढ़ें, 
आशा करता हूँ 
वे सोचें कि मैं हूँ कुछ प्राकृतिक --
जैसे कि वह बूढ़ा बरगद,
जिसकी छाँव में खेलते-खेलते 

थक कर धम्म से बैठ जाते थे
जब वे बच्चे थे,
और पोंछते थे पसीना 
तप रहे माथों का
धारीदार झबलों की आस्तीनों से.



-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'द कीपर ऑफ़ शीप ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

रविवार, दिसंबर 16, 2012

जो महसूस करते हैं हम...

फायर पेंटिंग, ईव क्लाइन
Fire Painting, Yves Klein 

केवल वही है हमारे पास
जो महसूस करते हैं हम,
वह नहीं जो महसूस होता है.
स्वाभाविक है जाड़ों का व्याकुल कर देना
भाग्य की तरह स्वीकार कर लेते हैं हम उसे.
इच्छा है कि जाड़े चाहे जितना लिपटे धरती को
हमारे मनों से दूर रहें,
क्योंकि जाते हैं हम
एक प्रेम से दूसरे प्रेम,
या एक किताब से दूसरी किताब,
भाती है हमें यह क्षणिक तीव्र आग.



-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( रिकार्दो रेइस)



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने रिकार्दो रेइस ( Ricardo Reis )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'ओड्ज़' से है.

इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 




बुधवार, नवंबर 14, 2012

नए शहर के कैफे में पहली चंद घड़ियाँ

कैफ़े तेरास, प्लास दयु फोरम
विन्सेंट वान गोग
Cafe Terrasse, Place du Forum
Vincent Van Gogh
आह,
वो पहली चंद घड़ियाँ नए शहरों के कैफे में!
एक शांत दीप्त मौन से पूर्ण,
स्टेशन या बंदरगाह पर सुबह-सुबह की आमद!जहाँ अभी-अभी पहुंचे हों
उस शहर के सबसे पहले दिखे पैदल लोग,
और जब हम यात्रा करते हैं, 
वह समय के बीतने की अनोखी आवाज़... 

बसें या ट्रामें या गाड़ियाँ...
अनूठे देशों में सड़कों की अनूठी छटा...
शान्ति, जो वे देती प्रतीत होती हैं हमारे दुःख को,
ख़ुशी-भरी हलचल, जो हमारी उदासी के लिए है उनके पास,
हमारे मुरझाये-हुए मन के लिए नीरसता की अनुपस्थिति!
बड़े, विश्वसनीय ढंग से समकोणीय चौक,
इमारतों की कतारों वाली सड़कें जो दूर जाकर मिल जाती हैं,
एक-दूसरे को काटती सड़कें जहाँ अपनी रूचि का कुछ-न-कुछ 
मिल जाता है अकस्मात ही,
और इस सब में, जैसे कुछ उमड़ता है बिना कभी बह निकलने के,
गति, गति,
द्रुत रंग की मानुषिक चीज़ जो आगे बढ़ जाती है और रह जाती है...

बंदरगाह अपने रुके हुए जहाज़ लिए,
अत्यधिक रूप से रुके हुए जहाज़,
और छोटी नावें पास में, प्रतीक्षा करती हुई...

  -- फेर्नान्दो पेस्सोआ  (आल्वरो द कम्पोस )





 
फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने  आल्वरो द कम्पोस (  Álvaro de Campos ) के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'अनकलेक्टिड पोइम्ज़ ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़           

गुरुवार, अक्टूबर 11, 2012

कम चाहोगे...

एक्सेंट ऑन रोज़, वैसिली कैँडिनस्की
Accent on Rose, Wassily Kandinsky



कम चाहोगे: सब होगा तुम्हारे पास
कुछ नहीं चाहोगे: तुम मुक्त हो जाओगे.
वही प्रेम जिस से हमें प्रेम किया जाता है
पीड़ित करता है हमें अपने चाहने से.




-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( रिकार्दो रेइस)



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने रिकार्दो रेइस ( Ricardo Reis )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'ओड्ज़' से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

मंगलवार, सितंबर 11, 2012

बेकार ही में भरे एक गिलास की तरह...

ग्लास ऑफ़ वाइन, पिएर-ओग्यूस्त रेनोआ
Glass of Wine, Pierre Auguste Renoir
बेकार ही में भरे एक गिलास की तरह
जो मेज़ पर से कोई नहीं उठाता,
मेरे दुःख-विहीन मन में उमड़ता है
वह दुःख जो उसका अपना नहीं है.

वह अभिनीत करता है उदास स्वप्न
करने के लिए केवल उनका अनुभव
और बचाने के लिए स्वयं को उस दुःख से
जिससे भयभीत होने का वह ढोंग कर रहा है.

कल्पित कथा,
और महीन कागज़ में लिपटी
जिस मंच पर वह खेली जा रही है
वह लकड़ी का नहीं है,
वह नक़ल उतारती है दुखों के नृत्य की
ताकि घटित ना हो कुछ भी.


-- फेर्नान्दो पेस्सोआ



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अपने ही नाम से लिखी थी, यह बताना ज़रूरी है क्योंकि अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'सोंगबुक 'से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.

इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

सोमवार, अगस्त 20, 2012

बच्चा जो हँसता है सड़क पर

प्रोफाइल एंड रेड चाइल्ड, मार्क शगाल
Profile and Red Child, Marc Chagall

बच्चा जो हँसता है सड़क पर
गीत जो अचानक सुनाई दे जाता है,
बेहूदा चित्र, नग्न प्रतिमा,
असीम कृपा -- 

ये सब कहीं अधिक है 
उस तर्क से 
जो बुद्धि ने थोपा है चीज़ों पर,
और इस सब में है कुछ-कुछ प्यार,
चाहे यह प्यार बोल नहीं सकता.



-- फेर्नान्दो पस्सोआ 



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अपने ही नाम से लिखी थी, यह बताना ज़रूरी है क्योंकि अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'सोंगबुक 'से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.

इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

शनिवार, जुलाई 21, 2012

लगभग अनाम-सी तुम मुस्कुराती हो

ला जोआ, मार्क शगाल
La Joie, Marc Chagall




लगभग अनाम-सी तुम मुस्कुराती हो
और सूरज चढ़ा देता है अपना सोना 
तुम्हारे बालों पर.
ऐसा क्यों है कि, खुश रहने के लिए,
हम जान नहीं सकते कि हम खुश हैं?













-- फेर्नान्दो पेस्सोआ






 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अपने ही नाम से लिखी थी, यह बताना ज़रूरी है क्योंकि अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'सोंगबुक 'से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.

इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

गुरुवार, जून 21, 2012

मैं ट्रेन से उतरा

सेंट लाज़ार स्टेशन, अराइवल ऑफ़ अ ट्रेन,
क्लौद  मोने
Saint-Lazare station, Arrival of a Train,
Claude Monet
मैं ट्रेन से उतरा
और 
उस आदमी को अलविदा कहा  
जिससे मैं मिला था.
हम अठारह घंटे साथ रहे थे 
और हमारे बीच हुई थी सुखद बातचीत,
यात्रा का साथ था,
और मुझे दुःख था ट्रेन से उतरने का, 
खेद था छोड़ के चले आने का 
इस संयोग से बने मित्र को,
जिसका नाम तक मैं नहीं जान पाया.
मैं भीगता महसूस कर रहा था
अपनी आँखों को...
हर विदाई एक मृत्यु है.
हाँ, हर विदाई एक मृत्यु है.
उस ट्रेन में जिसे हम जीवन कहते हैं,
हम सब संयोगिक घटनाएँ हैं
एक-दूसरे के जीवन की ,
और हमें दुःख होता है जब उतरने का समय आता है.

वह सब जो मानवीय है मुझे प्रभावित करता है, क्यूंकि मैं एक मनुष्य हूँ.
वह सब जो मानवीय है मुझे प्रभावित करता है, इसलिए नहीं कि मुझे 
मानवीय भावों या मानवीय मतों से लगाव है 
परन्तु इसलिए कि स्वयं मानवता के साथ मेरा असीम संसर्ग है.

वह नौकरानी जिसका बिलकुल मन नहीं था जाने का,
याद करके रोती है 
उस घर को जहाँ उस के साथ दुर्व्यवहार किया गया...

ये सब, मेरे मन में, है मृत्यु और दुनिया का दुःख.
ये सब जीता है, क्यूंकि वह मरता है, मेरे मन में .

और मेरा मन पूरे ब्रह्माण्ड से बस ज़रा-सा बड़ा है.


-- फेर्नान्दो पस्सोआ ( आल्वरो द कम्पोस )

 

  फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने आल्वरो द कम्पोस ( Álvaro de Campos )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.

इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

गुरुवार, मई 24, 2012

मुक्ति

स्टिल लाइफ विद बुक्स एंड कैंडल, ओंरी मातीस
Still Life With Books and Candle,
  Henri Matisse
ओह, कितना आनंद है
ना करने में किसी कर्त्तव्य का पालन!
पास में किताब का होना
और उसको ना पढ़ना!
किताब पढ़ना उबाऊ है.
पढ़ाई करना कुछ नहीं करना है.
सूरज बिना साहित्य पढ़े चमकता है.
नदियाँ बहती हैं, गलत या सही,
बिना किसी मूल संस्करण के.
और हौले-से बहती हवा, हर सुबह 

कितनी नैसर्गिक,
उसके पास है पर्याप्त समय और
नहीं है आगे दौड़ जाने का कोई कारण.

किताबें है केवल स्याही-रंगे कागज़.
पढ़ाई वह है जो शून्य और कुछ नहीं के बीच अंतर नहीं कर पाती.
सब से अच्छी है धुंध.
और कोई फर्क नहीं पड़ता कि दोम सेबास्चिऊ कभी लौटेंगे या नहीं.

बहुत अच्छे हैं कविता, दयालुता और नृत्य
मगर इस दुनिया में सब से अच्छे हैं बच्चे,
फूल, संगीत, चांदनी, और सूरज जिसकी एकमात्र गलती यह है कि
वह कभी-कभी जीवन को खिलाने के बजाय झुलसाने लगता है.

और इन सब से और किसी भी और चीज़ से बेहतर हैं इसा मसीह,
जो कुछ नहीं जानते थे वित्त के बारे में,
न ही उनके निजी पुस्तकालय के होने का पता है.




-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'द कीपर ऑफ़ शीप ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

गुरुवार, मार्च 22, 2012

मैं घास में लेट जाता हूँ

द बोयेज़ ऑन द ग्रास, इल्या रेपिन
The Boys on the Grass, Ilya Repin

मैं घास में लेट जाता हूँ
और भूल जाता हूँ
जो सब मुझे पढ़ाया गया है.
जो भी मुझे पढाया गया
उसने मुझे न कभी अधिक गर्माहट दी
न  ठंडक.
जो मुझे बताया गया कि विद्यमान है
नहीं बदला उसने
कभी किसी वस्तु का आकार.
जो भी मुझे दिखाया गया
उसने कभी नहीं छुआ मेरी आँखों को.
जिसकी भी ओर मेरा ध्यान खींचा गया
कभी वहां था ही नहीं :
केवल जो वहां था वहां था.



--  फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )




 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'द कीपर ऑफ़ शीप ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

देव जीवन से अधिक कुछ नहीं देते

ला ल्युनेत द'आप्रोश, रने माग्रीत
La Lunette d'Approche, Rene Magritte
देव जीवन से अधिक कुछ नहीं देते,
तो जो हमें आह्लादित करता है,
अनंत परन्तु अपुष्पित
जो उठा देता है विस्मयकारी ऊंचाइयों तक,
चलो उसे चाहना छोड़ दें.
स्वीकार करना -- बस केवल यही हो हमारा ज्ञान,
और जब तक है हमारी धमनियों में रक्त का प्रवाह,
जब तक प्यार कुम्हला नहीं जाता,
चलो यूँ ही चलते रहें
कांच के टुकड़ों की तरह: रोशनी में पारदर्शी,
टपकती उदास बारिश से टप-टपाते,
धूप में गुनगुने होते,
और करते थोडा-थोडा प्रतिबिंबित.


-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( रिकार्दो रेइस)


 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने रिकार्दो रेइस ( Ricardo Reis )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'ओड्ज़' से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

सोमवार, जनवरी 30, 2012

मैं चाहूँगा होना...

द लांगलोआ ब्रिज एट आर्ल विद विमेन वाशिंग,
विन्सेंट वान गोग
The Langlois Bridge at Arles with Women Washing,
Vincent Van Gogh

मैं चाहूँगा होना रास्ते की धूल 
और गरीबों के पैरों तले रौंदा जाना...

मैं चाहूँगा होना बहती नदी 
और धोबिनों का किनारे पर कपडे धोना...

मैं चाहूँगा होना नदी किनारे का पेड़ 
सर पर केवल आकाश पैरों में पानी लिए...

मैं चाहूँगा होना धोबी का गधा 
मार खाना फिर भी ख्याल रखवाना... 

बेहतर है ये सब 
बजाय इसके कि जीवन को ऐसे बिताना 
हमेशा मुड़-मुड़ के देखना और पछताना...


--  फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'द कीपर ऑफ़ शीप ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़  

गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

तुम जो रहस्यवादी हो...

द किंगफिशर, विन्सेंट वान गोग
The Kingfisher, Vincent van Gogh 

तुम जो रहस्यवादी हो, हर चीज़ में ढूंढते हो मायने.
हर चीज़ के हैं तुम्हारे लिए अस्पष्ट अभिप्राय.
जो कुछ भी देखते हो तुम, उसमें है कुछ छिपा हुआ.
जो कुछ भी देखते हो तुम, देखते हो, कुछ और देखने के लिए.

मैं, जिसके पास हैं केवल देखने के लिए आँखें,
सब चीज़ों में देखता हूँ मायनों की अनुपस्थिति.
और यह देख कर, खुद से प्यार करता हूँ मैं,
क्योंकि 
एक चीज़ होने का अर्थ है, कुछ भी न होना.
एक चीज़ होने का अर्थ है न होना वश में किसी व्याख्या के.


--  फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'द कीपर ऑफ़ शीप ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़     

शुक्रवार, नवंबर 25, 2011

असंख्य जीवन

टू सेल्फ पोर्ट्रेट्स एंड सेवेरल डीटेल्ज़, विन्सेंट वान गोग
Two Self Portraits and Several Details, Vincent Van Gogh

असंख्य जीवन बसते हैं हम में.
मैं नहीं जानता, 
जब मैं सोचता हूँ या महसूस करता हूँ,
वह कौन है जो सोचता या महसूस करता है.
मैं केवल वह स्थान हूँ 
जहाँ पर चीज़ें सोची या महसूस की जाती हैं.

एक से अधिक प्राण है मुझ में.
मुझ से भी अधिक मैं.
मैं विद्यमान हूँ, फिर भी, 
हूँ उन सब से उदासीन.
उन्हें मौन कर देता हूँ : मैं बोलता हूँ.

मैं क्या महसूस करता हूँ क्या नहीं
इसकी विरोधी प्रेरणाएं जूझती हैं 
जो मैं हूँ उस में, मगर 
मैं उन्हें अनदेखा कर देता हूँ. 
वे निर्धारित नहीं कर पाती उस मैं को 
जिसे मैं जानता हूँ: मैं लिखता हूँ.


-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( रिकार्दो रेइस)


 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने रिकार्दो रेइस ( Ricardo Reis )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'ओड्ज़' से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

सोमवार, अक्टूबर 24, 2011

पानी के बुलबुले

दी ओल्ड टावर इन द फील्ड्ज़, विन्सेंट वान गोग
The Old Tower In The Fields, Vincent Van Gogh

आग के एक बड़े अध-मिटे धब्बे-सा 
डूबता सूरज 
ठहरे बादलों में कुछ देर ठहर जाता है.
सांझ के मौन में दूर कहीं 
सुनता हूँ सीटी कि धीमी आवाज़. 
कोई रेलगाड़ी जा रही होगी.

इस पल में 
एक अस्पष्ट-सा विरह मुझे घेर लेता है 
साथ ही एक अज्ञात और शांत-सी चाह 
जो आती है जाती है.

ऐसे ही, कभी, नदियों की सतह पर,
होते हैं पानी के बुलबुले 
जो बनते हैं फिर फूट जाते हैं.
और उनका कोई अर्थ नहीं होता 
सिवाय पानी के बुलबुले होना 
जो बनते हैं फिर फूट जाते हैं.




--  फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'द कीपर ऑफ़ शीप ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़     

बुधवार, सितंबर 28, 2011

चांदनी में दूर कहीं...

व्हाईट सेलबोट एट शातू , मोरीस द व्लामिंक
White Sailboat At Chatou, Maurice de Vlaminck

चांदनी में दूर कहीं 
नदी पर एक किश्ती 
चुपचाप तैरती हुई.
कौन-सा रहस्य खोलती है?

नहीं जानता मैं, मगर मेरे 
भीतर के जीव को अचानक 
अजीब-सा लगने लगता है,
और मैं सपने देखता हूँ 
बिना उन सपनों को देखे 
जो मैं देख रहा हूँ.

क्या है यह वेदना
जो घेर लेती है मुझे?
क्या है यह प्यार
जो मैं समझा नहीं पाता?
वह किश्ती है जो आगे बढ़ जाती है 
इस रात मैं जो यहीं रह जाती है.


-- फेर्नान्दो पेस्सोआ



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अपने ही नाम से लिखी थी, यह बताना ज़रूरी है क्योंकि अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'सोंगबुक 'से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.

इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

कितनी बड़ी है यह उदासी

लाइंग काओ, विन्सेंट वान गोग
Lying Cow, Vincent Van Gogh

कितनी बड़ी है यह उदासी और 
यह कड़वाहट जो झोंक देती है 
हमारी नन्ही ज़िंदगियों को 
एक कोलाहल में !
ऐसा कितनी बार होता है 
कि दुर्भाग्य 
क्रूरता से हमें कुचल डालता है!
सुखी है वह जानवर, स्वयं से अनामित, 
जो हरे-हरे खेतों में चरता है,
और ऐसे प्रवेश करता है मृत्यु में 
जैसे कि वह उसका घर हो;
या वह विद्वान जो, अध्ययन में डूबा,
अपने निरर्थक सन्यासी जीवन को 
उठा लेता है हमारे जीवन से बहुत ऊपर,
धुंए की तरह, 
जो अपने विघटित होते हाथों को 
उठा देता है एक ऐसे स्वर्ग की ओर
जिसका अस्तित्व ही नहीं है.


-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( रिकार्दो रेइस)



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने रिकार्दो रेइस ( Ricardo Reis )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है. यह कविता उनके संकलन 'ओड्ज़' से है.
इस कविता का मूल पोर्त्युगीज़ से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.

इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

शुक्रवार, जुलाई 08, 2011

आज सवेरे

ए विंड बीटन ट्री, विन्सेंट वान गोग 
A Wind beaten Tree, Vincent Van Gogh

आज बहुत सवेरे मैं घर से निकल पड़ा 
क्योंकि मैं उस से भी जल्दी उठ बैठा था, 
और कुछ करने का मन भी नहीं था.

मैं नहीं जानता था किस ओर जाऊं,
मगर हवा बहुत ज़ोर से एक ओर को चल रही थी,
और जिस ओर वह धकेलती गयी, मैं चलता गया.

हमेशा ऐसा ही रहा है मेरा जीवन,
और हमेशा ऐसा ही रहे, यही चाहता हूँ --
मैं उधर ही जाऊं जिधर हवा मुझे बहा ले जाए
और कुछ सोचने की कभी आवश्यकता न हो.


--  फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



 फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'अनकलेक्टिड पोइम्ज़ ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़