गुरुवार, मई 24, 2012

मुक्ति

स्टिल लाइफ विद बुक्स एंड कैंडल, ओंरी मातीस
Still Life With Books and Candle,
  Henri Matisse
ओह, कितना आनंद है
ना करने में किसी कर्त्तव्य का पालन!
पास में किताब का होना
और उसको ना पढ़ना!
किताब पढ़ना उबाऊ है.
पढ़ाई करना कुछ नहीं करना है.
सूरज बिना साहित्य पढ़े चमकता है.
नदियाँ बहती हैं, गलत या सही,
बिना किसी मूल संस्करण के.
और हौले-से बहती हवा, हर सुबह 

कितनी नैसर्गिक,
उसके पास है पर्याप्त समय और
नहीं है आगे दौड़ जाने का कोई कारण.

किताबें है केवल स्याही-रंगे कागज़.
पढ़ाई वह है जो शून्य और कुछ नहीं के बीच अंतर नहीं कर पाती.
सब से अच्छी है धुंध.
और कोई फर्क नहीं पड़ता कि दोम सेबास्चिऊ कभी लौटेंगे या नहीं.

बहुत अच्छे हैं कविता, दयालुता और नृत्य
मगर इस दुनिया में सब से अच्छे हैं बच्चे,
फूल, संगीत, चांदनी, और सूरज जिसकी एकमात्र गलती यह है कि
वह कभी-कभी जीवन को खिलाने के बजाय झुलसाने लगता है.

और इन सब से और किसी भी और चीज़ से बेहतर हैं इसा मसीह,
जो कुछ नहीं जानते थे वित्त के बारे में,
न ही उनके निजी पुस्तकालय के होने का पता है.




-- फेर्नान्दो पेस्सोआ ( अल्बेर्तो काइरो )



फेर्नान्दो पेस्सोआ ( Fernando Pessoa )20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में उनकी गिनती होती है. यह कविता उन्होंने अल्बेर्तो काइरो ( Alberto Caeiro )के झूठे नाम से लिखी थी. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नाम या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो ये है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग जीवनी, स्वभाव, दर्शन, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ के जीतेजी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्ररी में उन पन्नों की एडिटिंग का काम आज तक जारी है. यह कविता उनके संकलन 'द कीपर ऑफ़ शीप ' से है.
इस कविता का मूल पुर्तगाली से अंग्रेजी में अनुवाद रिचर्ड ज़ेनिथ ने किया है.
इस कविता का हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

मंगलवार, मई 22, 2012

प्यार

द वेव, अलबर्ट बियरशटाड
The Wave, Albert Bierstadt
 
प्यार गुण है, दुनिया है प्यार का रूपकालंकार.
जलते हुए से, पतझड़ के पत्ते बहुत चाहते हैं हवा को,
उसकी उत्तेजित साँसों को,
और द्रुत लय में घूमते पहुँच जाते हैं अपनी मृत्यु के पास.
यहाँ ही नहीं, तुम हर कहीं हो.
                                      सांझ का आकाश
पूजता है धरती को, झुक-झुक जाता है, जवाब में
गहराते पर्वतों में धरती भी तरसती है. रात
है एक समानुभूति, आँखों में आंसुओं की जगह तारे लिए.
यहाँ नहीं,

तुम वहां हो जहाँ मैं खड़ी हूँ, किनारे के लिए पगलाते
सागर को सुनती, चाँद को धरती के लिए
तरसते, व्यथित होते देखती. जब सुबह होती है, सूरज,
उद्दीप्त, पेड़ों को सोने में ढंकता है, मौसमों में से,

                              

                                 उजले प्रेम के
कारणों में से, चल कर आते हो तुम मेरे पास.




-- कैरल एन डफ्फी

 


कैरल एन डफ्फी ( Carol Ann Duffy )स्कॉट्लैंड की कवयित्री व नाटककार हैं. वे मैनचेस्टर मेट्रोपोलिटन युनिवेर्सिटी में समकालीन कविता की प्रोफ़ेसर हैं. 2009 में वे ब्रिटेन की पोएट लॉरीअट नियुक्त की गईं. वे पहली महिला व पहली स्कॉटिश पोएट लॉरीअट हैं. उनके स्वयं के कई कविता संकलन छ्प चुके हैं. उन्होंने कई कविता संकलनों को सम्पादित भी किया है. अपने लेखन के लिए उन्हें अनेक सम्मान व अवार्ड मिल चुके हैं. सरल भाषा में लिखी उनकी कविताएँ अत्यंत लोकप्रिय हैं व स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा भी हैं. यह कविता उनके 2005 में छपे संकलन ' रैप्चर ' से है, जिसे टी एस एलीअट प्राइज़ मिला था.
इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़  
 

मैं अब भी क्यों लिखता हूँ कविताएँ

चार्लज़ सिमिक 


मैं अब भी क्यों लिखता हूँ कविताएँ 
(द न्यूयार्क रिव्यू ऑफ़ बुक्स ब्लॉग में 15 मई, 2012 को प्रकाशित लेख )

जब मेरी माँ बहुत वृद्ध थीं और अपने जीवन के अंतिम समय में नर्सिंग होम में भरती थीं, एक दिन यह पूछ कर उन्होंने मुझे चौंका दिया कि क्या मैं अब भी कविता लिखता हूँ. जब मैंने बेसमझे बूझे कहा कि हाँ अब भी लिखता हूँ, तो उन्होंने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे कुछ भी समझ न पाई हों ओर एकटक देखती रहीं. जो कह रहा था वह मुझे दोहराना पड़ा जब तक कि उन्होंने गहरी सांस लेकर अपना सर नहीं हिलाया, जैसे मन-ही-मन सोच रही हों कि मेरा यह बेटा हमेशा से ही थोडा पगला था. आज जब मैं अपने जीवन के सातवें दशक में चल रहा हूँ, वे लोग जो मुझे अच्छे से नहीं जानते समय-समय पर यह सवाल पूछ लेते हैं. मुझे शक है कि उनमे से कई लोग उम्मीद करते हैं कि मैं कहूँगा कि मुझे अक्ल आ गयी है और मैंने अपनी युवावस्था के इस पागलपन का परित्याग कर दिया है. अभी ऐसा नहीं हुआ है मुझे यह स्वीकार करते देख वे प्रत्यक्षतः विस्मित होते हैं. लगता है जैसे वे सोच रहे हैं कि इसमें कुछ एकदम अस्वाभाविक और शर्मनाक है, जैसे कि मैं इस उम्र में एक हाई-स्कूल की लड़की के साथ घूमता हूँ और रात में उसके साथ स्केटिंग करने जाता हूँ.

एक और सवाल, जो युवा और वृद्ध कवियों से साक्षात्कारों में अक्सर पूछा जाता है कि उन्होंने कवि बनने की कब और क्यों सोची. पूर्वधारणा यह है कि ऐसा कोई एक पल आया होगा जब उन्हें समझ आया कि कविता लिखने के सिवा उनकी कोई नियति नहीं है, जिसके बाद उन्होंने अपने परिवारों को अपना फैसला सुनाया और उनकी माताएँ चिल्लाईं: " हे भगवान, हम से क्या भूल हुई थी जो ऐसा हुआ?" और उनके पिता ने पतलून से बेल्ट खींच के निकाली और उन्हें कमरे में गोल-गोल दौड़ाया. मेरा खूब मन करता था कि मैं गंभीर चेहरा बना कर साक्षात्कारकर्ता से कहूँ कि मैंने कविता लिखना इसलिए चुना ताकि मैं इधर-उधर बिखरी पुरुस्कार राशि पर हाथ साफ़ कर सकूँ, चूंकि उन्हें यह बताना कि मेरे साथ ऐसी कोई बात हुई ही नहीं, निसंदेह उन्हें निराश करना होता. वे कोई वीरतापूर्ण और काव्यात्मक बात सुनना चाहते हैं. मैं उन्हें बताता हूँ कि मैं दूसरे हाई-स्कूल के लड़कों जैसा ही था जो कविताएँ लड़कियों को प्रभावित करने के लिए लिखता था, मगर उस से परे और कोई अभिलाषा नहीं थी. चूंकि मैं मूल-अंग्रेजी भाषी नहीं था, वे लोग मुझ से यह भी पूछते कि मैंने अपनी कविताएँ सर्बियाई भाषा में क्यों नहीं लिखी और मन-ही-मन अटकलें लगाते कि मैंने अपनी मातृभाषा को तजने का निर्णय कैसे लिया. एक बार फिर मेरा उत्तर उन्हें उथला लगता जब मैं समझाने का प्रयास करता कि कविता को फुसलाने के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने की पहली शर्त यही है कि वह समझ आए. किसी अमरीकी लड़की का ऐसे लड़के के प्यार में पड़ना असंभव ही था जो उसके संग बैठ कर कोक पीते हुए उसे सर्बियाई में लिखी प्रेम कविताएँ सुनाता.

मेरे लिए यह रहस्य की ही बात है कि मैंने कविताएँ लिखना तब भी जारी क्यों रखा जब उसकी कोई ज़रुरत नहीं रह गयी थी. मेरी शुरूआती कविताएँ शर्मनाक रूप से बेकार थी, और जो उसके एकदम बाद आयीं, वे भी कोई बेहतर नहीं थी. अपने जीवन में मैंने कई युवा कवियों को जाना है जिनमें अपरिमित प्रतिभा है मगर जिन्होंने, यह बताये जाने के बाद भी कि वे प्रतिभाशाली हैं, कविता लिखना त्याग दिया. यह गलती मेरे साथ किसी ने नहीं की, फिर भी मैं आगे बढ़ता रहा. मुझे अपनी आरंभिक कविताएँ नष्ट करने का खेद होता है, क्योंकि अब याद ही नहीं रहा कि वे किस से प्रभावित थी. जिन दिनों मैं उन्हें लिख रहा था, मैं अधिकतर कथा-साहित्य पढ़ रहा था और मुझे समकालीन कविता और आधुनिकतावादी कवियों के बारे में कम ज्ञान था. कविता से मेरा एकमात्र विस्तृत परिचय उस वर्ष हुआ था जब अमरीका आने से पहले मैं पेरिस के एक स्कूल में पढ़ा करता था. वे न केवल हमें लामार्तीन, ह्यूगो, बोदलेयर, रिम्बो और वर्लें पढ़ाते थे बल्कि उनकी कई कविताएँ याद करवाते थे जो हमें पूरी कक्षा के सामने सुनानी होती थी. मुझ जैसे अधपकी फ्रेंच बोलने वाले के लिए यह किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था -- और मेरे सहपाठियों के लिए निश्चित मनोरंजन, जो फ्रेंच साहित्य की कुछ सबसे सुन्दर और स्थापित रूप से प्रसिद्द पंक्तियों का मेरे द्वारा किया हुआ गलत उच्चारण देख, हंस-हंस के दोहरे हो जाते थे -- इतना कि उसके वर्षों बाद भी मैं यह जांचने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था कि आखिर मैंने उस कक्षा में क्या सीखा. आज मुझे स्पष्ट ज्ञात है कि मेरा कविता के प्रति प्रेम उन्हीं पाठों व अनुवाचनों से आया है, जिन्होंने मुझ पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ा जिसका अनुमान मैं युवावस्था में नहीं लगा पाया.


मुझे हाल ही में एहसास हुआ कि मेरे अतीत में ऐसा कुछ और भी है जिसने कविताएँ लिखते रहने की मेरी दृढ़ता में योगदान दिया है. वह है मेरा शतरंज के प्रति प्रेम. जब मैं छह वर्ष का था, युद्ध-ग्रस्त बेलग्रेड में मुझे एक खगोलशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर ने यह खेल खेलना सिखाया था. अगले कुछ वर्षों में मैं इतना अच्छा खेलने लगा था कि न केवल अपने हमउम्र बच्चों को हरा लेता बल्कि पड़ोस के कई बड़ों को भी. मुझे याद है कि मेरी पहली उनींदी रातें, हारी हुई और दिमाग में दुबारा खेली गयी बाज़ियों के वजह से थी. शतरंज ने मुझ धुन का पक्का और दृढ बना दिया. पहले ही, मैं एक गलत चाल या अपमानजनक हार भूल नहीं पाता था. मुझे ऐसी बाज़ियाँ बहुत पसंद थी जिसमें दोनों तरफ थोड़े ही प्यादे रह जाते हैं और हर एक चाल अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. आज भी, जब मेरा प्रतिद्वंदी एक कंप्यूटर प्रोग्राम है ( जिसे में गॉड बुलाता हूँ), जो मुझे 10 में से 9 बार मात देता है. मैं न केवल उसकी श्रेष्ठ बुद्धि से विस्मित हूँ, बल्कि अपनी हार को अपनी कभी-कभी की जीत से अधिक दिलचस्प पाता हूँ. जिस तरह की कविताएँ मैं लिखता हूँ -- अधिकतर छोटी जिन्हें संवारने की आवश्यकता अंतहीन होती है -- अक्सर मुझे शतरंज की बाज़ियों कि याद दिला देती हैं. अपनी सफलता के लिए वे निर्भर हैं शब्द और बिम्ब के सही क्रम में रखे जाने पर. उनका अंत होन चाहिए एक शह-मात की तरह, सुरूचिपूर्ण ढंग से संचालित, अवश्यम्भावी लेकिन अचंभित करने वाला.

निस्संदेह, अब यह सब कहना बहुत आसान है. जब मैं अट्ठारह बरस का था, मेरी चिंताएँ और थीं. मेरे माँ-बाप अलग हो गए थे और मैं अकेला था, शिकागो के एक दफ्तर में काम करता और रात को यूनिवर्सिटी की क्लास में उपस्थित रहता. फिर 1958 में जब मैं न्यूयार्क चला आया, वैसा ही जीवन जीता रहा. मैं कविताएँ लिखता. उनमें से कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित तो हो जाती, मगर मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि इन गतिविधियों से कुछ हासिल होगा. जिन लोगों के साथ मैं काम करता था, जिनसे दोस्ती करता था, किसी को इस बात की भनक भी नहीं थी कि मैं कवि हूँ. मैं थोड़ी चित्रकारी भी करता था, और किसी अनजान व्यक्ति को अपनी यह रूचि बताना मुझे अधिक आसान लगता था. मैं अपनी कविताओं के बारे में निश्चित रूप से बस एक ही बात जानता था कि वे उतनी अच्छी नहीं थीं जितनी मैं चाहता था कि वे हों. अपनी मानसिक शान्ति के लिए मैंने दृढ निश्चय किया था कि मैं कुछ ऐसा लिखूं जिसे अपने साहित्यिक मित्रों को दिखाने में मुझे शर्मिंदगी न महसूस हो. इस बीच अन्य आवश्यक बातों पर ध्यान देना ज़रूरी था, जैसे कि शादी करना, किराया देना,  बार और जैज़ क्लबों में अड्डा जमाना और हर रात, सोने से पहले, अपने ईस्ट तेरहवीं स्ट्रीट के अपार्टमेन्ट की चूहेदानियों में पीनट बटर का चारा डालना.

-- चार्लज़ सिमिक 

इस लेख का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

सोमवार, मई 21, 2012

शाम की सैर


  पाइन ट्रीज़, काप द'ओंतीब, क्लौद मोने
Pine Trees, Cap d'Antibes, Claude Monet
तुम आभास देते हो सुनने का
मेरे विचारों को, ओ पेड़ों,
इस तरह झुक कर उस सड़क पर जहाँ
मैं चल रहा हूँ इस गर्मियों के आखिर की शाम
जब तुम में से हर एक है एक खड़ी ढाल की सीढ़ी
जिससे रात नीचे उतर रही है.

पत्ते है मेरी माँ के होंठों जैसे,

हमेशा कांपते हुए, निर्णय करने में असमर्थ,
क्योंकि आज ज़रा हवा चल रही है,
और यह है कुछ आवाजें सुनने जैसा
या है दबी हुई हंसी से भरे हुए मुंह जैसा
जिसमे हम सब समा सकें एक बड़ा अँधेरा मुंह
अचानक एक हथेली से ढका हुआ.

सब शांत है. किसी और शाम
की रोशनी आगे टहल रही है,
बहुत समय पहले की शाम लम्बी ड्रेसों वाली,
नुकीले जूतों वाली, चांदी के सिगरेट-केस वाली.
आनंदित मन, तुम गहराते सायों में
जल्दी-जल्दी उन का पीछा करते हुए
कितने बोझिल कदम उठाते हो.

ऊपर आकाश अभी भी नीला है
रात के पंछी उन बच्चों की तरह हैं
जो भोजन के लिए नहीं आयेंगे.
स्वयं को गीत सुनाते खोये हुए बच्चे. 



-- चार्लज़ सिमिक





चार्लज़ सिमिक (Charles Simic ) एक सर्बियाई-अमरीकी कवि, निबंधकार, अनुवादक व दार्शनिक हैं। उनका जन्म युगोस्लाविया में हुआ और वे युद्ध-त्रस्त यूरोप में बड़े हुए। 1954 में,16 वर्ष की आयु में वे अपने परिवार के साथ अमरीका आ गए। 70 के दशक तक वे कवि के रूप में स्थापित हो गए। उनकी कविताएँ सूक्ष्म व बिम्बों से भरपूर होती हैं। वे पेरिस रिव्यू के सम्पादक रह चुके हैं व अमरीका के 15 वें पोएट लौरियेट भी। आजकल वे अमरीकी साहित्य व क्रिएटिव राइटिंग के प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं, व यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू हेम्पशियर में पढ़ाते हैं। उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं. उनकी कविताओं के 30 से अधिक संकलन, अनुवादों के 15 संकलन व गद्य के 8 संकलन प्रकाशित हो चुके है।
इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़ 

शनिवार, मई 19, 2012

आँखें

 सेल्फ-पोर्ट्रेट इन फेल्ट हैट, पॉल सेज़ान
Self-Portrait in Felt Hat, Paul Cezanne



जिस दिन उसकी प्रियतमा की मृत्यु हुई
उसने बूढ़े होने का फैसला कर लिया
और कर लिया स्वयं को बंद
अकेले, खाली घर के अन्दर
केवल उसकी यादों के साथ
और उस बड़े उजले आईने के साथ
जिस में देख कर वह अपने बाल बनाती थी.
इस सोने के बड़े से खंड को
वह एक लोभी की तरह सहेजता-बटोरता था,
सोचता था, कि कम-से-कम यहाँ तो
वह कैद कर लेगा बीते दिनों को,
सुरक्षित रख लेगा इस एक चीज़ को.

मगर पहली बरसी के आस-पास,

वह उसकी आँखों के बारे में सोचने लगा
और घबरा गया : वे भूरी थीं या काली,
या धूसर? हरी? हे भगवान! कह नहीं सकता....

वसंत की एक सुबह, उसके भीतर कुछ दरक गया;

अपने दोहरे दुःख को सलीब की तरह कंधे पर उठाये,
उसने बाहर का दरवाज़ा बंद किया, सड़क पर आया
और अभी दस गज भी न चला था कि एक अँधेरे प्रांगण से
उसे मिली एक जोड़ी आँखों की झलक. अपना हैट
नीचे खींच वह आगे बढ़ गया...हाँ, वे ऐसे ही थीं; ऐसी ही...



-- डान पेटरसन




डान पेटरसन ( Don Paterson ) स्कॉटलैंड के कवि,लेखक  व संगीतकार हैं. वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंट एंड्रूज़ में अंग्रेजी पढ़ाते हैं, लन्दन के प्रकाशक 'पिकाडोर' के लिए पोएट्री एडिटर हैं और एक बेहतरीन जैज़ गिटारिस्ट हैं . अपने पहले कविता संकलन 'निल निल' से ही उन्हें पहचाना जाने लगा व अवार्ड मिलने लगे. अपने संकलन ' गाडज़ गिफ्ट टू विमेन ' के लिए उन्हें टी एस एलीअट प्राइज़ प्राप्त हुआ. उनके एक और संकलन 'लैंडिंग लाईट ' को विटब्रेड पोएट्री अवार्ड व फिर से टी एस एलीअट प्राइज़ प्राप्त हुआ. उन्होंने दूसरी भाषाओँ से अंग्रेजी में बहुत अनुवाद भी किया है जिन में से सबसे उल्लेखनीय स्पेनिश कवि अंतोनियो मचादो व जर्मन कवि रिल्के की रचनाएँ हैं. उन्होंने कई कविता संकलनों का संपादन किया है, नाटक लिखे हैं व विशेष रूप से रेडियो नाटक लिखे हैं. यह कविता उनके संकलन 'आईज ' से है, जिसे  स्पेनिश कवि अंतोनियो मचादो की कविताओं का अनुवाद भी कहा जा सकता है, या कहा जा सकता है की ये कविताएँ, उनकी कविताओं से प्रेरित हैं.

इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़
 

गुरुवार, मई 17, 2012

कंधे

मैन कैरिंग बॉय, पिएर-ओग्यूस्त रनोआ 
Man Carrying Boy, Pierre-Auguste Renoir
बारिश में एक आदमी सड़क पार करता है 
कदम सावधानी से रखता, दो-दो बार उत्तर-दक्षिण देखता,
क्योंकि उसके कंधे पर उसका बेटा सो रहा है.

किसी गाड़ी से उस पर छींटे नहीं पड़ने चाहिए.
कोई  गाड़ी नहीं निकलनी चाहिए उस की छाया के भी पास से.

आदमी ढो रहा है दुनिया का सब से प्यारा माल 
मगर उस पर नहीं बना हुआ  कोई  चिन्ह. 
उसकी जैकिट पर कहीं नहीं लिखा -- फ्रैजाइल,
हैंडल विद केयर.

चलती साँसों का स्वर आदमी के कानों में भर जाता है.
वह सुनता है एक बच्चे के स्वप्न की गुंजन
अपने ही भीतर गहरे कहीं. 

इस दुनिया में 
हम रह नहीं पाएंगे
अगर हम एक-दूसरे के साथ 
नहीं तैयार वह करने को जो यह आदमी कर रहा है.

सड़क चौड़ी ही रहेगी.
बारिश कभी गिरनी बंद नहीं होगी.


-- नाओमी शिहाब नाए 



 नाओमी शिहाब नाए ( Naomi Shihab Nye )एक फिलिस्तीनी-अमरीकी कवयित्री, गीतकार व उपन्यासकार हैं. वे बचपन से ही कविताएँ लिखती आ रहीं हैं. फिलिस्तीनी पिता और अमरीकी माँ की बेटी, वे अपनी कविताओं में अलग-अलग संस्कृतियों की समानता-असमानता खोजती हैं. वे आम जीवन व सड़क पर चलते लोगों में कविता खोजती हैं. उनके 7 कविता संकलन और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. अपने लेखन के लिए उन्हें अनेक अवार्ड व सम्मान प्राप्त हुए हैं. उन्होंने अनेक कविता संग्रहों का सम्पादन भी किया है. यह कविता उनके संकलन " रेड सूटकेस " से है.  

इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़

मंगलवार, मई 15, 2012

एक दिन की कहानी

अ व्हीटफील्ड ऑन ए समर आफ्टरनून,
मार्क 
शगाल
A Wheatfield on a Summer Afternoon,
Marc Chagall
1.
बादल करते हैं कठिन परिश्रम  भविष्य के लिए 
और बारिश को करना है सिद्ध उनके श्रम का बल.
2.
जहाज़ उठा कर चलते हैं समुद्र को 
समुद्र 
कराहते हैं जहाज़ी-सपनों के बोझ तले 
3.
मेंढक पहनते हैं पानी के जूते.
अपनी सबसे सुन्दर कमीजें पहन पाखी प्रवास करते हैं.
4.
हवा गिर जाती है दूसरों के लिए बिछाए अपने ही जाल में.
5.
एक राजकुमारी-सा सूर्य बैठता है क्षितिज के प्रतीक्षा-कक्ष में.
मित्र होते हैं एकत्रित,
मकड़ियाँ और पंछी,
राजसी तितलियाँ और कामकाजी मधुमक्खियाँ,
झींगुर और छिपकलियाँ, 
एक ही इच्छा के अतिथि,
कोई अंतर नहीं झींगुरों और छिपकलियों के बीच.
सूर्य अपने रथ पर सवार चलता है 
और उसके अतिथि करते हैं राज्य पर शासन.
6.
एक पेड़ की टहनियों से उठती है आवाज़ 
हवा के, बिना उसको जाने,
बहा कर ले जाने के लिए.
7.
कवि जब लिखता है 
वह बन जाता है
भाषा के हाथों की वीणा.
8.
क्योंकि मैं प्रायः मौन रहता हूँ
शब्द मेरी खाल में से रिसते हैं.
9.
समय, तुम जो सिले हुए हो मुझ से,
मेरी कविताएँ तुम्हें काढ़ती हैं
और मेरी आवाज़ है अलंकरण और श्रृंगार.
10.
एक देह बन जाती है लिली का फूल और पानी में सोती है;
एक देह शासन करती है आग की झील पर.


-- अदुनिस



Adonis, Griffin Poetry Prize 2011 International Shortlist अली अहमद सईद अस्बार ( Ali Ahmed Said Asbar ), जो 'अदुनिस' ( Adonis )के नाम से लिखते हैं, सिरिया के प्रसिद्ध कवि व लेखक हैं. वे आधुनिक अरबी कविता के पथप्रदर्शक हैं, जिन्होंने पुरानी मान्यताओं से विद्रोह कर कविता के अपने ही नियम बनाये हैं. अब तक अरबी में उनकी 20से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. उनके अनेक कविता संग्रह अंग्रेजी में अनूदित किये जा चुके हैं. अभी हाल-फिलहाल में, अगस्त माह के आखिरी सप्ताह में ही उन्हें 2011 के  गेटे ( Goethe) पुरुस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें जल्द ही नोबेल प्राइज़ भी मिलेगा , साहित्य जगत में इसकी उम्मीद व अटकलें खूब हैं, वे कई बार नामित भी किये गए हैं. यह कविता उनके संकलन 'सेलेब्रेटिंग वेग-क्लियर थिंग्ज़' से है.
इस कविता का मूल अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद खालेद मत्तावा ने किया है.
इस कविता का हिन्दी में अनुवाद -- रीनू  तलवाड़